संस्कृत शिक्षा
संस्कृत एक प्राचीन भाषा है। इसे सीखना निश्चित ही गौरव की बात है। यहाँ हम संस्कृत सीखने के इच्छुक लोगों के लिए कहानी के माध्यम से आरम्भ करेंगे।
प्रथम पग
वर्णमाला
आचार्य पूर्णेन्दु अपने आश्रम में अपने गगन गंभीर स्वर में हनुमान जी महाराज की प्रार्थना कर रहे थे-
"अंजनी गर्भसम्भूतं, केसरीनन्दनं तथा।
सकलारिष्टनाशार्थे, वन्देऽहम् पवनात्मजम्।।
तब ही कुछ संस्कृतानुरागी बच्चे व युवक-युवतियाँ आचार्य से प्रार्थना करते हैं- हे आचार्यवर! हम संस्कृत-प्रेमियों को संस्कृत का ज्ञान करवाइए!
आचार्य - आपने संस्कृत सीखने का विचार किया , यह स्वागत-योग्य है। इस तरह आपने भारतीय संस्कृति को समझने की ओर पहला कदम बढ़ाया है।
हम इसके #वर्णमाला को समझते हैं ।
संस्कृत वर्णमाला में दो प्रकार के वर्ण हैं -
१) स्वर तथा २) व्यंजन।
स्वर
प्रश्न- स्वर किसे कहते हैं?
उत्तर- जिन वर्णों का उच्चारण स्वतंत्र होता है ,अर्थात्- अन्य वर्णों की सहायता के बिना जिनका उच्चारण किया जाता है, वे स्वर कहलाते हैं।
ये दो प्रकार के होते हैं -१) मूल स्वर २) संयुक्त/मिश्रित स्वर
मूल स्वरों के दो रूप पाए जाते हैं- १) ह्रस्व स्वर- अ इ उ ऋ ऌ।
इनका उच्चारण समय एक मात्रा है।
प्रश्न- एक मात्रा कैसे जानेंगें?
उत्तर- मानव को अपने पलक झपकाने में लगने वाला सामान्य समय ही एक मात्रा है।
२) दीर्घ स्वर- आ ई ऊ ॠ। उच्चारण समय - दो मात्रा।
मिश्रित स्वर- ए,ऐ,ओ,औ।
इनका उच्चारण दीर्घ होता है।
प्रश्न- प्लुत क्या होता है?
उत्तर- किसी को आवाज देते समय जो वर्ण लम्बे समय तक उच्चरित होता है, वह प्लुत कहलाता है। जैसे- देवदत्तऽऽऽ।
यहाँ अन्तिम वर्ण प्लुत है।
व्यञ्जन
संस्कृत वर्णमाला में व्यंजन ३ प्रकार के होते हैं -- १) स्पर्श २) अन्तःस्थ ३) ऊष्म।
प्रश्न- गुरूजी! ये स्पर्श व्यंजन क्या हैं?
उत्तर - बताता हूँ। जिन वर्णों के उच्चारण वाग्यन्त्रों के परस्पर स्पर्श करने से होते हैं वे स्पर्श वर्ण कहलाते हैं। वाग्यंत्र याने हमारे बोलने के अंग। जैसे- जिह्वा,दाँत, ओठ आदि।
इनके ५ समूह हैं जिन्हें वर्ग कहा जाता है। प्रत्येक वर्ग में ५ वर्ण हैं । इस प्रकार ५×५=२५ हैं। प्रत्येक वर्ग उसके प्रथम वर्ण से जाना जाता है। जैसे -
कवर्ग- क् ख् ग् घ् ङ्।
चवर्ग- च् छ् ज् झ् ञ्।
टवर्ग- ट् ठ् ड् ढ् ण्।
तवर्ग - त् थ् द् ध् न्।
पवर्ग- प् फ् ब् भ् म्।
प्रश्न- गुरूजी ये व्यंजनों के नीचे(्) चिह्न क्यों लगाया?
उत्तर- ये हलन्त कहलाते हैं। ये बतलाते हैं कि यह शुद्ध व्यंजन है। उच्चारण के लिए इसमें स्वर नहीं मिला है।
क्+अ= क हलन्त रहित वर्ण स्वर मिश्रित होता है।
प्रश्न- क्या इनका उच्चारण स्थान निश्चित है?
उत्तर- हाँ अवश्य ।
कवर्ग को कंठ से बोला जाता है। अतः उसे कण्ठ्य कहा जाता है।
चवर्ग तालू से उच्चरित होता है, अतः तालव्य कहलाता है।
प्रश्न- तालू किसे कहते हैं?
उत्तर- जीभ को पीछे की ओर ले जाओ। एक कोमल स्थल मिलता है वही तालू कहलाता है।
टवर्ग मूूर्धा के स्पर्श से उच्चरित होता है। जीभ को ऊपर स्पर्श करो। एक कठोर भाग का स्पर्श होगा। यही मूर्धा है। अतः टवर्ग को मूर्धन्य कहते हैं ।
पवर्ग ओठों के स्पर्श से उच्चरित होता है। अतः औष्ठ्य कहलाता है। ।
अन्तःस्थ व ऊष्म।
आचार्य- हम लोगों ने स्पर्श समझ लिया है । अब अन्तःस्थ व ऊष्म को समझते हैं ।
अन्तःस्थ- य्,र्,ल् ,व्,
इन चारों वर्णों के उच्चारण में वाग्यंत्र स्पर्श नहीं करते अपितु एक रगड़ से ये उच्चरित होते हैं ।
प्रश्न- इन्हें अन्तःस्थ क्यों कहते हैं?
उत्तर- इनका उच्चारण स्वर व व्यंजन के मध्य होता है अतः अन्तःस्थ कहलाते हैं।
हाँ तो ऊष्म वर्ण चार हैं - श्,ष्,स्,ह्,।
ये इनके उच्चारण के समय आघात के साथ गर्म वायु निकलती है। अतः ऊष्म वर्ण कहलाते हैं।
प्रश्न- एक स से काम चल सकता है,तो तीन स की क्या जरूरत?
उत्तर- ह ह ह । बेटा तीनों का उच्चारण स्थल भिन्न-भिन्न है व इनसे बनने वाले शब्दों के अर्थों में भी भिन्नता है।
श का उच्चारण तालू से होता है तो ष का मूर्धा से तथा स का दन्त से।
संस्कृत शब्द 'सकल' का अर्थ है पूरा। वहीं 'शकल' का अर्थ है टुकड़ा।
तो हुआ न अर्थ में अन्तर!
ह को आघात के साथ बोला जाता है।
इनके अतिरिक्त दो अयोगवाह भी हैं। ये अयोगवाह केवल स्वरों का अनुसरण करते हैं। याने केवल स्वर-युक्त वर्ण में ही जुड़ते हैं।
१) अनुस्वार (ं) २) विसर्ग (:)
प्रश्न- गुरुजी! विसर्ग का उच्चारण अह् होता है न। जैसे कविह् गुरुह्।
उत्तर- वस्तुतः जिस स्वर के बाद यह जुड़ता है उसके उच्चारण को ग्रहण कर लेता है । लिखित रूप में कुछ इस तरह समझ सकते हैं- बाल: (अन्त में अ है अतः यह कहलाएगा अकारांत वर्ण) इसके बाद विसर्ग आने पर उच्चारण होगा बालह् ।
इकारान्त शब्द कविः का उच्चारण का लिखित रूप होगा कविहि।
उकारान्त शब्द गुरुः का उच्चारण कुछ इस तरह होगा गुरुहु।
प्रश्न- गुरुजी इसमे क्ष,त्र,ज्ञ नहीं होते?
उत्तर- ये संस्कृत वर्णमाला के भाग नहीं हैं। किन्तु ये संयुक्त वर्ण हैं।
क्+ष्+अ= क्ष
त्+र्+अ=त्र
ज्+ञ्+अ= ज्ञ
होता है।
चलिए रात हो गयी है। घर जाइए। कल हम संस्कृत के लिंगों के विषय में जानेंगें।
संस्कृत एक प्राचीन भाषा है। इसे सीखना निश्चित ही गौरव की बात है। यहाँ हम संस्कृत सीखने के इच्छुक लोगों के लिए कहानी के माध्यम से आरम्भ करेंगे।
प्रथम पग
वर्णमाला
आचार्य पूर्णेन्दु अपने आश्रम में अपने गगन गंभीर स्वर में हनुमान जी महाराज की प्रार्थना कर रहे थे-
"अंजनी गर्भसम्भूतं, केसरीनन्दनं तथा।
सकलारिष्टनाशार्थे, वन्देऽहम् पवनात्मजम्।।
तब ही कुछ संस्कृतानुरागी बच्चे व युवक-युवतियाँ आचार्य से प्रार्थना करते हैं- हे आचार्यवर! हम संस्कृत-प्रेमियों को संस्कृत का ज्ञान करवाइए!
आचार्य - आपने संस्कृत सीखने का विचार किया , यह स्वागत-योग्य है। इस तरह आपने भारतीय संस्कृति को समझने की ओर पहला कदम बढ़ाया है।
हम इसके #वर्णमाला को समझते हैं ।
संस्कृत वर्णमाला में दो प्रकार के वर्ण हैं -
१) स्वर तथा २) व्यंजन।
स्वर
प्रश्न- स्वर किसे कहते हैं?
उत्तर- जिन वर्णों का उच्चारण स्वतंत्र होता है ,अर्थात्- अन्य वर्णों की सहायता के बिना जिनका उच्चारण किया जाता है, वे स्वर कहलाते हैं।
ये दो प्रकार के होते हैं -१) मूल स्वर २) संयुक्त/मिश्रित स्वर
मूल स्वरों के दो रूप पाए जाते हैं- १) ह्रस्व स्वर- अ इ उ ऋ ऌ।
इनका उच्चारण समय एक मात्रा है।
प्रश्न- एक मात्रा कैसे जानेंगें?
उत्तर- मानव को अपने पलक झपकाने में लगने वाला सामान्य समय ही एक मात्रा है।
२) दीर्घ स्वर- आ ई ऊ ॠ। उच्चारण समय - दो मात्रा।
मिश्रित स्वर- ए,ऐ,ओ,औ।
इनका उच्चारण दीर्घ होता है।
प्रश्न- प्लुत क्या होता है?
उत्तर- किसी को आवाज देते समय जो वर्ण लम्बे समय तक उच्चरित होता है, वह प्लुत कहलाता है। जैसे- देवदत्तऽऽऽ।
यहाँ अन्तिम वर्ण प्लुत है।
व्यञ्जन
संस्कृत वर्णमाला में व्यंजन ३ प्रकार के होते हैं -- १) स्पर्श २) अन्तःस्थ ३) ऊष्म।
प्रश्न- गुरूजी! ये स्पर्श व्यंजन क्या हैं?
उत्तर - बताता हूँ। जिन वर्णों के उच्चारण वाग्यन्त्रों के परस्पर स्पर्श करने से होते हैं वे स्पर्श वर्ण कहलाते हैं। वाग्यंत्र याने हमारे बोलने के अंग। जैसे- जिह्वा,दाँत, ओठ आदि।
इनके ५ समूह हैं जिन्हें वर्ग कहा जाता है। प्रत्येक वर्ग में ५ वर्ण हैं । इस प्रकार ५×५=२५ हैं। प्रत्येक वर्ग उसके प्रथम वर्ण से जाना जाता है। जैसे -
कवर्ग- क् ख् ग् घ् ङ्।
चवर्ग- च् छ् ज् झ् ञ्।
टवर्ग- ट् ठ् ड् ढ् ण्।
तवर्ग - त् थ् द् ध् न्।
पवर्ग- प् फ् ब् भ् म्।
प्रश्न- गुरूजी ये व्यंजनों के नीचे(्) चिह्न क्यों लगाया?
उत्तर- ये हलन्त कहलाते हैं। ये बतलाते हैं कि यह शुद्ध व्यंजन है। उच्चारण के लिए इसमें स्वर नहीं मिला है।
क्+अ= क हलन्त रहित वर्ण स्वर मिश्रित होता है।
प्रश्न- क्या इनका उच्चारण स्थान निश्चित है?
उत्तर- हाँ अवश्य ।
कवर्ग को कंठ से बोला जाता है। अतः उसे कण्ठ्य कहा जाता है।
चवर्ग तालू से उच्चरित होता है, अतः तालव्य कहलाता है।
प्रश्न- तालू किसे कहते हैं?
उत्तर- जीभ को पीछे की ओर ले जाओ। एक कोमल स्थल मिलता है वही तालू कहलाता है।
टवर्ग मूूर्धा के स्पर्श से उच्चरित होता है। जीभ को ऊपर स्पर्श करो। एक कठोर भाग का स्पर्श होगा। यही मूर्धा है। अतः टवर्ग को मूर्धन्य कहते हैं ।
पवर्ग ओठों के स्पर्श से उच्चरित होता है। अतः औष्ठ्य कहलाता है। ।
अन्तःस्थ व ऊष्म।
आचार्य- हम लोगों ने स्पर्श समझ लिया है । अब अन्तःस्थ व ऊष्म को समझते हैं ।
अन्तःस्थ- य्,र्,ल् ,व्,
इन चारों वर्णों के उच्चारण में वाग्यंत्र स्पर्श नहीं करते अपितु एक रगड़ से ये उच्चरित होते हैं ।
प्रश्न- इन्हें अन्तःस्थ क्यों कहते हैं?
उत्तर- इनका उच्चारण स्वर व व्यंजन के मध्य होता है अतः अन्तःस्थ कहलाते हैं।
हाँ तो ऊष्म वर्ण चार हैं - श्,ष्,स्,ह्,।
ये इनके उच्चारण के समय आघात के साथ गर्म वायु निकलती है। अतः ऊष्म वर्ण कहलाते हैं।
प्रश्न- एक स से काम चल सकता है,तो तीन स की क्या जरूरत?
उत्तर- ह ह ह । बेटा तीनों का उच्चारण स्थल भिन्न-भिन्न है व इनसे बनने वाले शब्दों के अर्थों में भी भिन्नता है।
श का उच्चारण तालू से होता है तो ष का मूर्धा से तथा स का दन्त से।
संस्कृत शब्द 'सकल' का अर्थ है पूरा। वहीं 'शकल' का अर्थ है टुकड़ा।
तो हुआ न अर्थ में अन्तर!
ह को आघात के साथ बोला जाता है।
इनके अतिरिक्त दो अयोगवाह भी हैं। ये अयोगवाह केवल स्वरों का अनुसरण करते हैं। याने केवल स्वर-युक्त वर्ण में ही जुड़ते हैं।
१) अनुस्वार (ं) २) विसर्ग (:)
प्रश्न- गुरुजी! विसर्ग का उच्चारण अह् होता है न। जैसे कविह् गुरुह्।
उत्तर- वस्तुतः जिस स्वर के बाद यह जुड़ता है उसके उच्चारण को ग्रहण कर लेता है । लिखित रूप में कुछ इस तरह समझ सकते हैं- बाल: (अन्त में अ है अतः यह कहलाएगा अकारांत वर्ण) इसके बाद विसर्ग आने पर उच्चारण होगा बालह् ।
इकारान्त शब्द कविः का उच्चारण का लिखित रूप होगा कविहि।
उकारान्त शब्द गुरुः का उच्चारण कुछ इस तरह होगा गुरुहु।
प्रश्न- गुरुजी इसमे क्ष,त्र,ज्ञ नहीं होते?
उत्तर- ये संस्कृत वर्णमाला के भाग नहीं हैं। किन्तु ये संयुक्त वर्ण हैं।
क्+ष्+अ= क्ष
त्+र्+अ=त्र
ज्+ञ्+अ= ज्ञ
होता है।
चलिए रात हो गयी है। घर जाइए। कल हम संस्कृत के लिंगों के विषय में जानेंगें।

बहुत अच्छा ।
ReplyDeleteThanks and Regards
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